हमारा इतिहास · OUR HISTORY
जड़ों से जुड़ा,
भविष्य की ओर बढ़ता कलवार समाज
भगवान श्री बलभद्र की श्रद्धा और हैहय वंश के सम्राट सहस्रबाहु अर्जुन की परंपरा से लेकर आज के डिजिटल कलवार समाज तक — यह हमारी सदियों लंबी यात्रा की कहानी है: श्रद्धा, व्यापार-कौशल, संगठन और निरंतर आगे बढ़ने का संकल्प।
सर्वप्रथम · हमारे आराध्य देव
भगवान श्री बलभद्र
Bhagwan Balbhadra (Balarama) — कुलगुरु व आराध्य
भगवान श्री बलभद्र (बलराम) श्रीकृष्ण के बड़े भाई और यदुवंश (चंद्रवंश) के दिव्य अवतार हैं। भागवत परंपरा में उन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है — वही शेष, जिन पर भगवान विष्णु शयन करते हैं; कुछ वैष्णव परंपराओं में वे विष्णु के आठवें अवतार के रूप में भी गिने जाते हैं। ब्याहुत कलवार संघ जैसे संगठनों के आयोजनों में उन्हें समाज के कुलगुरु के रूप में पूजा जाता है।
पुराणों के अनुसार उनका गर्भ देवकी से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किया गया, इसी कारण वे संकर्षण कहलाए। हाथ में हल और मूसल धारण करने वाले बलभद्र बल, धर्म और श्रम के प्रतीक हैं। मथुरा और मध्य प्रदेश के तुमैन से हल-मूसलधारी बलराम की प्राचीन मूर्तियाँ मिली हैं, जो लगभग दूसरी–पहली सदी ई.पू. की मानी जाती हैं — यानी उनकी उपासना की परंपरा बहुत पुरानी है।
- बलराम
- बलदेव
- बलभद्र
- हलधर
- हलायुध
- संकर्षण
- दाऊजी
- माता-पिता
- वसुदेव और रोहिणी (गर्भ देवकी से स्थानांतरित)
- भाई-बहन
- श्रीकृष्ण (छोटे भाई) और सुभद्रा
- पत्नी
- रेवती (राजा ककुद्मी की पुत्री)
- शस्त्र
- हल और मूसल (गदा)
- वंश
- यदुवंश — चंद्रवंश
- स्वरूप
- शेषनाग के अवतार / विष्णु के अवतार
हल — श्रम और कृषि का प्रतीक
हल धारण करने के कारण वे किसान और परिश्रमी समाज के आराध्य हैं; उन्हें कृषि और श्रम की शक्ति का देवता भी कहा जाता है।
आदर्श भाई और गुरु
श्रीकृष्ण के बड़े भाई के रूप में स्नेह, संरक्षण और मर्यादा के प्रतीक; महाभारत में भीम और दुर्योधन को गदायुद्ध की शिक्षा देने वाले गुरु माने जाते हैं।
जगन्नाथ त्रय में स्थान
पुरी की रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ और देवी सुभद्रा के साथ भगवान बलभद्र की भी पूजा होती है।
आराध्य के बाद · वंश के महान सम्राट
राजराजेश्वर सहस्रबाहु अर्जुन
Our Roots — हैहय वंश की परंपरा (पुराणों और जनश्रुति में)
कलवार (क्षेत्र के अनुसार कलाल या कलार) समाज की परंपरागत मान्यता में समाज का मूल चंद्रवंश की यदुवंशी शाखा — हैहय वंश से जुड़ता है। पुराणों के अनुसार हैहय, महाराज यदु के वंशज थे। इसी वंश में महान सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन हुए, जिन्हें हज़ार भुजाओं की महिमा के कारण सहस्रबाहु और राजराजेश्वर कहा जाता है।
उनकी राजधानी महिष्मती नर्मदा के तट पर थी। अनेक विद्वान इसे वर्तमान मध्य प्रदेश के महेश्वर नगर से पहचानते हैं। पौराणिक कथाओं में उन्हें न्यायप्रिय, पराक्रमी और भगवान दत्तात्रेय का परम भक्त बताया गया है।
शब्द-अर्थ: सहस्र = हज़ार, बाहु = भुजा। शुद्ध रूप “सहस्र” है; बोलचाल में “सहस्त्र” भी लिखा जाता है।
दत्तात्रेय-भक्ति
पुराणों में वे भगवान दत्तात्रेय के कृपापात्र और परम भक्त बताए गए हैं।
नर्मदा और महिष्मती
नर्मदा किनारे बसी उनकी राजधानी वैभव और शक्ति का केंद्र मानी गई।
रावण-प्रसंग
रामायण (उत्तरकांड) व पुराणों में नर्मदा का प्रवाह भुजाओं से रोकने और रावण को परास्त करने का वर्णन मिलता है।
परशुराम-प्रसंग
कामधेनु और ऋषि जमदग्नि से जुड़ी कथा में परशुराम से संघर्ष का वर्णन है; आगे पुत्र जयध्वज राजगद्दी पर बैठे।
इतिहास की रोशनी में
कलचुरी (हैहय) राजवंश
Kalachuris of Tripuri — शिलालेख क्या कहते हैं
इतिहास में हैहय परंपरा का सबसे स्पष्ट प्रमाण कलचुरी राजवंश के अभिलेखों में मिलता है। मध्य भारत में त्रिपुरी (वर्तमान तेवर, जबलपुर के निकट) को केंद्र बनाकर चेदि–डाहल क्षेत्र पर शासन करने वाले कलचुरी राजाओं ने अपने शिलालेखों — बिलहरी, ग्यारसपुर, कर्ण के वाराणसी ताम्रपत्र और खैरहा के लेख — में स्वयं को हैहय वंश और कार्तवीर्य अर्जुन का वंशज बताया है।
कोकल्ल प्रथम
कलचुरी वंश के पहले शक्तिशाली शासकों में गिने जाते हैं; उनके पुत्र की शाखा आगे चलकर रतनपुर (छत्तीसगढ़) में स्थापित हुई।
गांगेयदेव
प्रतापी शासक, जिनके स्वर्ण सिक्के इतने प्रसिद्ध हुए कि उत्तर-मध्य भारत में “गांगेयदेव शैली” के सिक्के चलन में रहे।
लक्ष्मीकर्ण (कर्ण)
वंश के सबसे प्रसिद्ध राजा; “त्रिकलिंगाधिपति” की उपाधि धारण की और अपने समय के बड़े शासकों में गिने गए।
रतनपुर शाखा
छत्तीसगढ़ के रतनपुर (रत्नपुर) में “हैहय” कहलाने वाली कलचुरी शाखा, जो त्रिपुरी वंश की ही एक शाखा थी।
समय की धारा में
हमारी यात्रा — समयरेखा
Our Journey through time
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पौराणिक परंपरा
यदुवंश — बलभद्र और हैहय परंपरा
आराध्य भगवान श्री बलभद्र यदुवंश के दिव्य अवतार हैं; इसी वंश की हैहय शाखा में सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हुए। नर्मदा तट की महिष्मती उनकी राजधानी मानी जाती है।
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लगभग 9वीं–12वीं सदी
कलचुरी राजवंश का उत्कर्ष
त्रिपुरी (जबलपुर के निकट) से चेदि–डाहल क्षेत्र पर शासन। शिलालेखों में कार्तवीर्य अर्जुन से वंश-दावा; छत्तीसगढ़ के रतनपुर में इसकी शाखा।
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मध्यकाल से 19वीं सदी
बाज़ार और व्यापार से जुड़ा समुदाय
अभिलेखों व विद्वानों के अध्ययन में कलवार/कलाल का उल्लेख बाज़ार-व्यापार से जुड़े समूह के रूप में मिलता है, जिसका परंपरागत संबंध आसवन (शराब बनाने–बेचने) के कार्य से भी दर्ज है।
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1890 का दशक
पहचान की नई खोज
इलाहाबाद जैसे क्षेत्रों के कलवारों ने क्षत्रिय (हैहय) पहचान को सार्वजनिक रूप से रखना शुरू किया।
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20वीं सदी का आरंभ
संगठन और सुधार का दौर
जाति-सभाओं व संगठनों ने पारंपरिक पेशे से आगे बढ़कर शिक्षा, सामान्य व्यापार और सामाजिक सुधार पर ज़ोर दिया। यहीं से समाज की नई, संगठित पहचान की नींव मज़बूत हुई।
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स्वतंत्र भारत
शिक्षा और सेवा का विस्तार
व्यापार के साथ-साथ सरकारी सेवा, सेना-पुलिस, कानून, राजनीति, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और उद्योग में समाज की भागीदारी बढ़ी। अनेक राज्यों में समाज पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल है; नियम राज्य-अनुसार अलग हैं।
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आज · 2026
डिजिटल कलवार समाज
देश-विदेश में फैले परिवारों को जोड़ने वाला यह पोर्टल — सदस्य निर्देशिका, रोज़गार, वैवाहिक, व्यापार, कार्यक्रम और सहयोग — सब एक ही मंच पर।
श्रद्धा और परंपरा
हमारे आराध्य
Our Revered Deities

भगवान श्री बलभद्र (बलराम)
विशेषकर ब्याहुत कलवार समाज में भगवान बलभद्र आराध्य देव और कुलगुरु के रूप में पूजे जाते हैं। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बलभद्र जन्मोत्सव और पूजनोत्सव होते हैं, तथा विवाह से पूर्व “बलभद्र मनावन” जैसी पारिवारिक परंपराएँ निभाई जाती हैं।

राजराजेश्वर श्री सहस्रबाहु अर्जुन
समाज के अनेक परिवार उन्हें कुलदेव और आदर्श पूर्वज के रूप में पूजते हैं। महेश्वर (म.प्र.) का राजराजेश्वर मंदिर उनसे जुड़ा प्रमुख स्थान माना जाता है, जहाँ 11 अखंड नंदादीप सदियों से प्रज्वलित रहने की परंपरा है।
पहचान और व्यवस्था
नाम, उपसमूह और सामाजिक ताना-बाना
Names, sub-groups and social structure
अलग-अलग नाम
उत्तर और मध्य भारत में समाज कलवार, कलाल या कलार नाम से जाना जाता है। नाम क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं, पर पहचान और परंपरा साझा हैं।
उपसमूह और उपनाम
जायसवाल, ब्याहुत (व्याहुत) और भगत जैसे समूह/उपनाम प्रचलित हैं; लोग गुप्ता, साह, प्रसाद आदि भी लिखते हैं। “जायसवाल” को प्रायः उत्तर प्रदेश के जायस नगर से जोड़ा जाता है — यह प्रचलित अनुमान है।
कहाँ-कहाँ फैला है समाज
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल सहित देश के अनेक राज्यों और विदेशों में।
मूल व्यवस्था (Mul System)
हर परिवार अपने पूर्वजों से जुड़े एक मूल (वंश-समूह) से पहचाना जाता है। यह व्यवस्था वैवाहिक संबंधों में मार्गदर्शन देती है और पारिवारिक जुड़ाव व सामाजिक अनुशासन बनाए रखती है।
संगठन (Sangathan)
राष्ट्रीय, राज्य, ज़िला और शहर स्तर की सांगठनिक इकाइयाँ समाज को एक-दूसरे का सहारा बनाती हैं — शिक्षा, विवाह, व्यापार और सेवा के कार्यों में।
कुल परंपराएँ
कुलदेव-पूजन, पारिवारिक अनुष्ठान और रीति-रिवाज़ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा और घर-परिवार के अनुष्ठानों से आगे बढ़ते आए हैं।
परिश्रम और प्रगति
पेशों की यात्रा
From traditional trade to every field
समय के साथ समाज ने अपने परंपरागत कारोबार से आगे बढ़कर लगभग हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है। ब्रिटिश काल के नियमों और समाज के अपने संगठनों के प्रयास से 20वीं सदी में यह बदलाव तेज़ हुआ।
- व्यापार
- उद्योग
- कृषि
- शिक्षा
- सेना व पुलिस
- सरकारी सेवा
- कानून
- चिकित्सा
- राजनीति
- समाज-सेवा
आगे की राह
उसी एकता को, डिजिटल युग में
यह पोर्टल सदियों पुरानी एकता की भावना को आगे ले जाने का प्रयास है — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने वंश, अपने मूल और अपने समाज के इतिहास से जुड़ी रहें।
आधार और संदर्भ Sources
इस पेज की सामग्री पुराणों की परंपरा, कलचुरी अभिलेखों, इतिहास-अध्ययनों और समाज की वर्तमान गतिविधियों की रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है:
- विकिपीडिया लेख: Balarama, Kalwar (caste), Kartavirya Arjuna, Kalachuris of Tripuri, Kalachuris of Ratnapura, Gangeyadeva, Lakshmikarna, Maheshwar, Jaiswal (surname)
- भागवत पुराण, विष्णु पुराण व महाभारत की परंपरा (भगवान बलभद्र / बलराम); दृक पंचांग — Lord Balarama
- C. A. Bayly, “Patrons and Politics in Northern India” (1973); P. H. M. van den Dungen, “Changes in status and occupation in nineteenth century Panjab” (1968)
- V. V. Mirashi, Inscriptions of the Kalachuri-Chedi Era (Corpus Inscriptionum Indicarum, vol. IV)
- K. S. Singh, People of India (Anthropological Survey of India); Joshua Project — Kalwar Jaiswal profile
- आराध्य-पूजन परंपरा पर हाल की समाचार रिपोर्टें: प्रभात खबर (सुपौल, बेतिया, गोड्डा), अमर उजाला (कुशीनगर)
नोट: यह इतिहास पौराणिक परंपरा, उपलब्ध अभिलेखों और समाज की मान्यताओं का सामान्य परिचय है; अलग-अलग क्षेत्रों में अलग मत भी हैं। आपके पास प्रामाणिक दस्तावेज़, शोध-सामग्री या सुधार का सुझाव हो तो कृपया संपर्क पेज से बताएँ, ताकि इस पेज को और सटीक बनाया जा सके। · सामग्री की समीक्षा: अक्टूबर 2026